📕 भगवद्गीता

अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग

भगवद्गीता · अध्याय 15 20 श्लोक · पूरा अध्याय
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग

संसार एक उलटा पीपल का पेड़ है — जड़ें ऊपर (ब्रह्म), शाखाएँ नीचे (लोक), छन्द (वेद) उसके पत्ते। यह अध्याय इसी रूपक से शुरू होता है।

15.7 में जीव को परमात्मा का सनातन अंश बताया गया है। 15.14 का “अहं वैश्वानरो भूत्वा” श्लोक भोजन से पहले रोज़ बहुत घरों में पढ़ा जाता है। 15.15 कहता है — मैं सबके हृदय में बैठा हूँ। अंत में क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम — तीन पुरुषों का वर्णन और परमात्मा का “पुरुषोत्तम” नाम।

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15.1 — ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्
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15.2 — अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य
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15.3 — न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
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15.4 — ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्
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15.5 — निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाः
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15.6 — न तद्भासयते सूर्यः
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15.7 — ममैवांशो जीवलोके
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15.8 — शरीरं यदवाप्नोति
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15.9 — श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च
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15.10 — उत्क्रामन्तं स्थितं वापि
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15.11 — यतन्तो योगिनश्चैनम्
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15.12 — यदादित्यगतं तेजः
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15.13 — गामाविश्य च भूतानि
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15.14 — अहं वैश्वानरो भूत्वा
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15.15 — सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः
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15.16 — द्वाविमौ पुरुषौ लोके
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15.17 — उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः
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15.18 — यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्
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15.19 — यो मामेवमसम्मूढः
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15.20 — इति गुह्यतमं शास्त्रम्