जो इस अध्याय की पूरी बात — क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम — बिना भ्रम के समझ लेता है, उसके लिए क्या होता है? वह सर्वज्ञ हो जाता है। और जब वह सर्वज्ञ होता है, तो भजन भी पूरे भाव से होता है।
यहाँ 'सर्वभावेन' — पूरे अस्तित्व से। जैसे बच्चा माँ के पास जाकर सब भूल जाता है — न डर, न हिचकिचाहट — वैसी ही यह भक्ति है।
ज्ञान और भक्ति यहाँ अलग नहीं हैं। जो सच में जानता है, वही सच में भजता है। यह श्लोक इस बात की पुष्टि करता है।