📿 श्लोक संग्रह

यो मामेवमसम्मूढः

गीता 15.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
यः माम् एवम्
जो मुझे इस प्रकार
असम्मूढः
मूढ़ता-रहित होकर
जानाति
जानता है
पुरुषोत्तमम्
पुरुषोत्तम रूप में
सः सर्वविद्
वह सर्वज्ञ
भजति माम्
मुझे भजता है
सर्वभावेन
सर्वभाव से (पूर्ण समर्पण से)
भारत
हे भरतवंशी (अर्जुन)

जो इस अध्याय की पूरी बात — क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम — बिना भ्रम के समझ लेता है, उसके लिए क्या होता है? वह सर्वज्ञ हो जाता है। और जब वह सर्वज्ञ होता है, तो भजन भी पूरे भाव से होता है।

यहाँ 'सर्वभावेन' — पूरे अस्तित्व से। जैसे बच्चा माँ के पास जाकर सब भूल जाता है — न डर, न हिचकिचाहट — वैसी ही यह भक्ति है।

ज्ञान और भक्ति यहाँ अलग नहीं हैं। जो सच में जानता है, वही सच में भजता है। यह श्लोक इस बात की पुष्टि करता है।

15.19 उपदेश का उपसंहार है। 15.20 उसकी घोषणा करेगा। यहाँ ज्ञान का फल — सर्वज्ञता और सर्वभाव-भक्ति — बताया गया है।

परंपरा में यह श्लोक ज्ञान और भक्ति की एकता का प्रमाण माना जाता रहा है। 'सर्वविद्' — सर्वज्ञ — यहाँ सांसारिक ज्ञान नहीं, आत्म-तत्व की पूर्ण समझ है।

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