📿 श्लोक संग्रह

यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्

गीता 15.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
यस्मात्
क्योंकि
क्षरम् अतीतः अहम्
मैं क्षर से परे हूँ
अक्षरात् अपि च उत्तमः
और अक्षर से भी उत्तम हूँ
अतः
इसीलिए
अस्मि
हूँ
लोके
लोक में
वेदे च
और वेद में भी
प्रथितः
प्रसिद्ध
पुरुषोत्तमः
पुरुषोत्तम नाम से

अब श्रीकृष्ण स्वयं अपने नाम की सार्थकता बताते हैं। मैं क्षर (नश्वर) से परे हूँ — इसलिए क्षर नहीं। और अक्षर (अविनाशी) से भी उत्तम हूँ — इसलिए केवल अक्षर भी नहीं। दोनों से ऊपर — इसीलिए 'पुरुषोत्तम'।

यह नाम लोक में भी प्रसिद्ध है और वेद में भी। जैसे किसी परिवार का सबसे बड़ा और सबसे प्रिय व्यक्ति होता है जिसे सब मान देते हैं — वैसे ही तीनों तत्वों में यह परमात्मा सर्वोपरि है।

यह श्लोक एक प्रकार से त्रयी का उपसंहार है। क्षर जाना, अक्षर जाना, और अब जाना कि इन दोनों से परे परमात्मा है — और वही पुरुषोत्तम है।

15.18 त्रयी (15.16-18) का समापन है। 'पुरुषोत्तम' नाम इस अध्याय का शीर्षक है — पुरुषोत्तमयोग। श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं इस नाम की व्याख्या देते हैं।

परंपरा में यह श्लोक 'पुरुषोत्तम' पद की परिभाषा के रूप में उद्धृत किया जाता रहा है। वेदांत-परंपरा में यह तीन तत्वों — जीव, माया, ईश्वर — के भेद का सुंदर काव्यात्मक सारांश माना जाता है।

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