📿 श्लोक संग्रह

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः

गीता 15.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
उत्तमः पुरुषः तु अन्यः
उत्तम पुरुष तो इन दोनों से अलग है
परमात्मा इति उदाहृतः
परमात्मा कहलाता है
यः
जो
लोकत्रयम् आविश्य
तीनों लोकों में प्रवेश करके
बिभर्ति
धारण करता है
अव्ययः ईश्वरः
अव्यय (अविनाशी) ईश्वर

क्षर और अक्षर — दोनों को जाना। अब एक तीसरा है। वह इन दोनों से ऊपर है, इन दोनों से अलग है — परमात्मा। 'उत्तमः पुरुषः' — सबसे उत्तम।

वह तीनों लोकों में — स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल — प्रवेश करके सबको धारण किए हुए है। जैसे धागा मोतियों में से गुज़रता है और माला बनाता है — परमात्मा वैसे ही सब में व्याप्त होकर सब को जोड़े हुए है।

यह ईश्वर अव्यय है — न घटता है, न बढ़ता है। क्षर घटता है, अक्षर टिका रहता है, पर यह परमात्मा इन दोनों का आधार है।

15.17 त्रयी का मध्य-बिंदु है। 15.16 में क्षर-अक्षर था, 15.18 में पुरुषोत्तम का नाम आएगा। यहाँ परमात्मा की परिभाषा दी गई है — तीनों लोकों में व्यापक, धारण करने वाला, अव्यय ईश्वर।

परंपरा में 'लोकत्रयमाविश्य बिभर्ति' — यह वाक्यांश विष्णु-सहस्रनाम और उपनिषदों की सर्वव्यापकता की उक्तियों के साथ पढ़ा जाता रहा है।

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