📿 श्लोक संग्रह

द्वाविमौ पुरुषौ लोके

गीता 15.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
द्वौ इमौ पुरुषौ
ये दो पुरुष
लोके
इस जगत् में
क्षरः च
क्षर (नश्वर) और
अक्षरः एव च
अक्षर (अविनाशी)
क्षरः
क्षर
सर्वाणि भूतानि
सब प्राणी और पदार्थ
कूटस्थः
कूट (अचल पर्वत) की तरह स्थित
अक्षरः उच्यते
अक्षर कहलाता है

यहाँ से श्रीकृष्ण एक नई बात शुरू करते हैं — अस्तित्व के दो प्रकार। पहला क्षर — जो बदलता रहता है, जो आता-जाता है। यह सब प्राणी, सब पदार्थ, सब नाम-रूप। दूसरा अक्षर — जो नहीं बदलता, जो टिका रहता है।

अक्षर को 'कूटस्थ' कहा गया — जैसे पर्वत की चट्टान पर निहाई (कूट) रखकर धातु को कूटा जाता है, पर निहाई नहीं हिलती — वैसे ही यह अक्षर अविचल है। सब कुछ उसके आसपास बदलता है, वह नहीं।

यह विभाजन समझने से संसार की समझ साफ़ होती है। जो दिखता है — क्षर है। जो भीतर टिका है — अक्षर है।

15.16 से 15.18 एक त्रयी है। पहले क्षर-अक्षर का भेद (15.16), फिर दोनों से परे पुरुषोत्तम (15.17), और फिर 'पुरुषोत्तम' नाम की सार्थकता (15.18)। यह अध्याय का दार्शनिक शिखर है।

परंपरा में यह श्लोक क्षर-अक्षर-पुरुषोत्तम — तीन तत्वों की प्रसिद्ध त्रयी का आरंभ माना जाता है। 'कूटस्थ' पद गीता में कई स्थानों पर (6.8, 12.3) भी आता है।

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