📿 श्लोक संग्रह

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाः

गीता 15.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
निर्मानमोहाः
मान और मोह से रहित
जितसङ्गदोषाः
संगति के दोष जीत लिए जिन्होंने
अध्यात्मनित्याः
अध्यात्म में सदा लगे रहने वाले
विनिवृत्तकामाः
कामनाओं से विरत
द्वन्द्वैः विमुक्ताः
द्वंद्वों से मुक्त
सुखदुःखसंज्ञैः
सुख-दुख नामक
गच्छन्ति
जाते हैं
अमूढाः
जो मूढ़ नहीं हैं
पदम् अव्ययम् तत्
उस अविनाशी पद को

अब श्रीकृष्ण बताते हैं — कौन से लोग उस परम पद को पाते हैं? पाँच गुण गिनाए गए हैं। पहला — मान (प्रतिष्ठा की चाह) और मोह (भ्रम) से मुक्ति। दूसरा — संगति के दोष जीत लेना यानी बुरी संगत का असर न पड़ना।

तीसरा — अध्यात्म में नित्य लगे रहना। चौथा — कामनाओं का विरत होना। पाँचवाँ — सुख-दुख के द्वंद्वों से मुक्ति। जैसे बरसात में भी जो किसान अपने खेत पर ध्यान टिकाए रखे, उसे मौसम परेशान नहीं करता।

यह गुण एक दिन में नहीं आते। लेकिन श्रीकृष्ण यहाँ यह नहीं कह रहे कि तुम ऐसे बनो — वे बता रहे हैं कि जो ऐसे होते हैं, वे उस पद को पाते हैं।

15.4 में उस पद की खोज का संकेत था। 15.5 उस पद को पाने वाले की पहचान देता है। यह श्लोक एक तरह से साधक के लक्षणों का सारांश है।

परंपरा में इस श्लोक को जीवनमुक्त के लक्षणों के प्रसंग में उद्धृत किया जाता रहा है। 'अमूढाः' — जो मूढ़ नहीं हैं — यह पद विशेष है; 15.10-11 में भी 'मूढ़' और 'ज्ञानी' का भेद फिर आएगा।

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