यह श्लोक परम धाम का एक अनोखा वर्णन है। हम जो कुछ देखते हैं — सूर्य का उजाला, चंद्रमा की चाँदनी, दीपक की लौ — यह सब उस परम स्थान को प्रकाशित नहीं कर सकते। वह स्थान स्वयं प्रकाशमान है।
जैसे दिन में सूर्य की रोशनी से आँख चौंधिया जाती है लेकिन सूरज खुद आँखों से देखा नहीं जाता — उस परम धाम की भी ऐसी ही बात है। वह भीतर का प्रकाश है, बाहरी रोशनी से परे।
और वहाँ जाने के बाद वापसी नहीं। यही उस स्थान की पहचान है। श्रीकृष्ण इसे 'मेरा परम धाम' कहते हैं — यह उनकी अपनी उपस्थिति का स्थान है।