📿 श्लोक संग्रह

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च

गीता 15.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
श्रोत्रम्
कान
चक्षुः
आँख
स्पर्शनम्
त्वचा (स्पर्श की इंद्रिय)
रसनम्
जिह्वा (रस की इंद्रिय)
घ्राणम् एव च
और नाक भी
अधिष्ठाय
आश्रय लेकर
मनः च अयम्
और मन का भी
विषयान् उपसेवते
विषयों का सेवन करता है

15.7 में बताया कि जीव मन और इंद्रियों को आकर्षित करता है। 15.8 में बताया कि ये उसके साथ चलती हैं। अब 15.9 में बताया जा रहा है — इनके माध्यम से जीव क्या करता है? विषयों का सेवन।

पाँच कर्मेंद्रियाँ हैं — कान से ध्वनि, आँख से रूप, त्वचा से स्पर्श, जिह्वा से रस, नाक से गंध। और इन सबके पीछे मन है — जो तय करता है किस विषय में जाना है और किसमें नहीं। जीव इन छहों के द्वारा संसार से जुड़ा रहता है।

यह वर्णन बुरा नहीं है — यह सिर्फ़ यथार्थ है। जैसे घर में खिड़कियाँ होती हैं — उनसे रोशनी भी आती है, धूल भी। इंद्रियाँ ऐसी ही खिड़कियाँ हैं।

15.7 से 15.9 एक साथ मिलकर जीव की इंद्रिय-जगत से संपर्क की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। यह तीन श्लोकों का क्रम — अंशता, यात्रा, सेवन — गीता की शिक्षण-शैली का सुंदर उदाहरण है।

परंपरा में इस श्लोक को पाँच ज्ञानेंद्रियों और मन की सूची के रूप में याद किया जाता रहा है। 'मनश्चायम्' — मन को छठा जोड़ना विशेष है।

अध्याय 15 · 9 / 20
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