श्रीकृष्ण यहाँ एक बहुत सरल उपमा देते हैं। जब हम फूलों के बाग से गुज़रते हैं तो हवा उस फूल की खुशबू को साथ ले आती है। हवा को हम देख नहीं सकते, लेकिन खुशबू आती है — हमें पता चलता है हवा वहाँ से आई।
ठीक ऐसे ही, जब जीव एक शरीर छोड़कर दूसरे में जाता है, तो अपने संस्कारों — मन और इंद्रियों की आदतों — को साथ ले जाता है। शरीर छूट जाता है, पर भीतर की प्रवृत्तियाँ नहीं छूटतीं।
यहाँ जीव को 'ईश्वरः' कहा गया है — अपने शरीर का स्वामी। यह छोटा-सा शब्द बताता है कि जीव निर्जीव नहीं, वह सक्रिय है, चेतन है।