📿 श्लोक संग्रह

गामाविश्य च भूतानि

गीता 15.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
गाम् आविश्य
धरती में प्रवेश करके
च भूतानि
और सब प्राणियों को
धारयामि अहम्
मैं धारण करता हूँ
ओजसा
अपनी शक्ति से
पुष्णामि च
और पुष्ट करता हूँ
औषधीः सर्वाः
सभी औषधियों को
सोमः भूत्वा
सोम (चंद्रमा/रस) बनकर
रसात्मकः
रस-स्वरूप होकर

15.12 में प्रकाश था — सूर्य, चंद्र, अग्नि का तेज। 15.13 में धारण और पोषण की बात है। श्रीकृष्ण कहते हैं — मैं धरती में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को टिकाए हुए हूँ।

और सोम — यानी चंद्रमा का अमृत, रस — बनकर मैं सब औषधियों, पौधों, वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ। धरती पर जो हरियाली है, जो अन्न है, जो जड़ी-बूटियाँ हैं — उनमें जो जीवन-रस है, वह मेरा ही है।

जैसे एक माँ पूरे घर को थामे रहती है — बच्चे भी नहीं जानते, वृद्ध माता-पिता भी नहीं जानते — बस घर चलता रहता है। वैसे ही यह धरण-शक्ति चुपचाप काम करती है।

15.12 से शुरू हुई विभूति-शृंखला का यह दूसरा श्लोक है। बाहरी प्रकाश के बाद अब धरती और उसकी धारण-शक्ति का वर्णन है। 'सोमो भूत्वा रसात्मकः' — यह पद वैदिक परंपरा में सोम के रस-स्वरूप से जुड़ा है।

परंपरा में यह श्लोक पृथ्वी पर जीवन की संभावना के स्रोत के रूप में देखा जाता रहा है। 'ओजसा' — शक्ति — यह वह प्राण-शक्ति है जो सृष्टि को धारण करती है।

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