15.12 में प्रकाश था — सूर्य, चंद्र, अग्नि का तेज। 15.13 में धारण और पोषण की बात है। श्रीकृष्ण कहते हैं — मैं धरती में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को टिकाए हुए हूँ।
और सोम — यानी चंद्रमा का अमृत, रस — बनकर मैं सब औषधियों, पौधों, वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ। धरती पर जो हरियाली है, जो अन्न है, जो जड़ी-बूटियाँ हैं — उनमें जो जीवन-रस है, वह मेरा ही है।
जैसे एक माँ पूरे घर को थामे रहती है — बच्चे भी नहीं जानते, वृद्ध माता-पिता भी नहीं जानते — बस घर चलता रहता है। वैसे ही यह धरण-शक्ति चुपचाप काम करती है।