📿 श्लोक संग्रह

अहं वैश्वानरो भूत्वा

गीता 15.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
अहम् वैश्वानरः
मैं वैश्वानर (जठराग्नि)
भूत्वा
बनकर
प्राणिनाम् देहम् आश्रितः
प्राणियों के शरीर में रहते हुए
प्राणापानसमायुक्तः
प्राण और अपान वायु से युक्त होकर
पचामि
पचाता हूँ
अन्नम् चतुर्विधम्
चार प्रकार का अन्न

यह गीता का एक ऐसा श्लोक है जो प्रत्येक भोजन के समय याद आता है। 'अहं वैश्वानरो भूत्वा' — मैं वैश्वानर (जठर-अग्नि) बनकर तुम्हारे भीतर रहता हूँ। जो भोजन तुम खाते हो — चबाकर, पीकर, चाटकर या चूसकर — यह चारों प्रकार का भोजन मैं ही पचाता हूँ।

इसीलिए भोजन से पहले परंपरा में यह श्लोक पढ़ा जाता है। भोजन केवल पेट भरना नहीं — उस परमात्मा को अर्पण है जो हमारे भीतर जठराग्नि के रूप में बैठा है।

जैसे घर में चूल्हा जलता है और उसकी आँच पर सब पकता है — उस आँच को हम अलग से नहीं देखते, पर वह है। वैश्वानर वैसी ही आंतरिक अग्नि है।

यह विभूति-शृंखला का तीसरा और सबसे निकट का श्लोक है — पहले बाहरी प्रकाश (15.12), फिर धरती की धारण-शक्ति (15.13), अब शरीर के भीतर की अग्नि (15.14)। श्रीकृष्ण बाहर से भीतर की ओर आए हैं।

परंपरा में यह श्लोक भोजन-मंत्र के रूप में प्रसिद्ध है। गीता प्रेस के संस्करण में भी इसे दैनिक पाठ के योग्य बताया गया है। 'वैश्वानर' का उल्लेख छांदोग्य उपनिषद् (5.11-24) में भी वैसे ही विस्तार से मिलता है।

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