यहाँ से श्रीकृष्ण अपनी विभूतियाँ बताते हैं — सृष्टि में जो भी तेज, शक्ति, जीवन है वह सब उन्हीं से है। सूर्य की रोशनी, चंद्रमा की चाँदनी, रात को जलती अग्नि — इन सबमें जो प्रकाश है वह उन्हीं का है।
जैसे एक बड़े दीपक से छोटे-छोटे दीपक जलाए जाएँ — हर दीपक की रोशनी उस मूल दीपक का विस्तार है। सूर्य, चंद्र, अग्नि — ये सब उस एक परम तेज के विस्तार हैं।
यह श्लोक 15.6 की बात को पलट कर देखता है। वहाँ कहा था — परम धाम को सूर्य प्रकाशित नहीं करता। यहाँ कहा — सूर्य में जो तेज है वह मेरा ही है। दोनों एक ही सत्य के दो पहलू हैं।