📿 श्लोक संग्रह

यदादित्यगतं तेजः

गीता 15.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
यत् आदित्यगतम् तेजः
सूर्य में जो तेज है
जगत् भासयते अखिलम्
सारे जगत् को प्रकाशित करता है
यत् चन्द्रमसि
जो चंद्रमा में है
यत् च अग्नौ
और जो अग्नि में है
तत् तेजः
वह तेज
विद्धि मामकम्
मेरा ही जानो

यहाँ से श्रीकृष्ण अपनी विभूतियाँ बताते हैं — सृष्टि में जो भी तेज, शक्ति, जीवन है वह सब उन्हीं से है। सूर्य की रोशनी, चंद्रमा की चाँदनी, रात को जलती अग्नि — इन सबमें जो प्रकाश है वह उन्हीं का है।

जैसे एक बड़े दीपक से छोटे-छोटे दीपक जलाए जाएँ — हर दीपक की रोशनी उस मूल दीपक का विस्तार है। सूर्य, चंद्र, अग्नि — ये सब उस एक परम तेज के विस्तार हैं।

यह श्लोक 15.6 की बात को पलट कर देखता है। वहाँ कहा था — परम धाम को सूर्य प्रकाशित नहीं करता। यहाँ कहा — सूर्य में जो तेज है वह मेरा ही है। दोनों एक ही सत्य के दो पहलू हैं।

15.12 से 15.15 तक श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में अपनी विभूतियाँ बताते हैं — तेज (15.12), धारण-शक्ति और सोम (15.13), वैश्वानर अग्नि (15.14), और हृदय में स्थिति (15.15)। यह क्रम देखने योग्य है — बाहर से भीतर की ओर।

परंपरा में यह श्लोक गीता अध्याय 10 की विभूतियों (10.21 — ज्योतिषां रविरंशुमान्) के साथ पढ़ा जाता रहा है।

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