📿 श्लोक संग्रह

यतन्तो योगिनश्चैनम्

गीता 15.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
यतन्तः योगिनः
यत्न करने वाले योगी
च एनम्
इसको
पश्यन्ति
देखते हैं
आत्मनि अवस्थितम्
आत्मा में स्थित
यतन्तः अपि
यत्न करते हुए भी
अकृतात्मानः
जिन्होंने आत्मा को सँवारा नहीं
न एनम् पश्यन्ति
इसे नहीं देखते
अचेतसः
अविवेकी

15.10 में कहा था — ज्ञानचक्षु वाले देखते हैं। अब 15.11 में बताया जा रहा है कि देखना यत्न से होता है। योगी — जो भीतर की ओर मुड़े हैं — वे इस जीव-तत्व को आत्मा में देखते हैं।

लेकिन एक और बात है — 'अकृतात्मा'। यत्न तो वे भी करते हैं। लेकिन उनकी आत्मा अभी कच्ची है — जैसे कच्ची मिट्टी से बना घड़ा पानी नहीं रोक सकता। यत्न काफ़ी नहीं, भीतर की परिपक्वता चाहिए।

यह कठोर बात नहीं है — यह एक वास्तविकता है। जो बीज अभी अंकुरित नहीं हुआ, वह फूल नहीं दे सकता। पर बीज में संभावना है — और यत्न उस संभावना को जगाता है।

15.10-11 एक जोड़ी हैं — पहले बाहरी भेद (मूढ़/ज्ञानी), फिर साधना के भेद (कृतात्मा/अकृतात्मा)। 'अकृतात्मा' पद गीता में केवल यहाँ आता है।

परंपरा में इस श्लोक को साधना की अपरिहार्यता के प्रमाण के रूप में उद्धृत किया जाता रहा है — केवल बाहरी प्रयास से ज्ञान नहीं मिलता, भीतर की तैयारी भी चाहिए।

अध्याय 15 · 11 / 20
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