पहले श्लोक में संसार को उलटे पीपल से जोड़ा गया। अब यहाँ उस पेड़ का और विस्तार किया गया है। इस पेड़ की शाखाएँ ऊपर भी हैं — देवलोक तक — और नीचे भी — पशु-पक्षी और कीट-पतंग तक। तीनों गुण — सत्व, रज, तम — इन्हीं शाखाओं को पोषण देते हैं।
इन शाखाओं के अंकुर विषय-भोग हैं — जो हम देखते, सुनते, छूते, चाहते हैं। बीज से पेड़ उगता है, पेड़ से फिर बीज — ऐसे ही कर्म से जन्म और जन्म से फिर कर्म। यही चक्र है।
नीचे की जड़ें मनुष्य लोक में हैं क्योंकि यहीं से कर्म का बंधन बनता है। मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जो कर्म करने में स्वतंत्र है। इसीलिए यहाँ की जड़ें कर्मों से बँधी बताई गई हैं।