📿 श्लोक संग्रह

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते

गीता 15.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
न रूपम्
स्वरूप नहीं
अस्य
इसका
इह
यहाँ (इस संसार में)
तथा उपलभ्यते
वैसा समझ में नहीं आता
न अन्तः
न अंत है
न आदिः
न आदि है
न सम्प्रतिष्ठा
न स्थिति (आधार) है
अश्वत्थम् एनम्
इस पीपल को
सुविरूढमूलम्
खूब गहरी जड़ों वाला
असङ्गशस्त्रेण
आसक्ति-रहितता रूपी शस्त्र से
दृढेन
दृढ़ता से
छित्त्वा
काटकर

यह संसार-वृक्ष इतना उलझा हुआ है कि हम इसकी न जड़ देख सकते हैं, न ठीक-ठीक शाखाएँ गिन सकते हैं। इसका न कोई आदि दिखता है, न अंत। जब हम किसी पुराने बरगद के पेड़ को देखते हैं — उसकी जड़ें कहाँ से शुरू हुईं, यह कहना मुश्किल होता है। संसार भी ऐसा ही है।

इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं — इसे समझने की कोशिश करते रहने से काम नहीं चलेगा। एक काम करना होगा — इसे काटना होगा। और काटने का हथियार है वैराग्य — यानी आसक्ति से मुक्ति।

यह वैराग्य कोई उदासी नहीं है। यह एक दृढ़ शस्त्र है — जैसे अनाज की फ़सल काटने के लिए तेज़ हँसिया चाहिए। भीतर की आसक्ति को एक बार दृढ़ता से काटना होगा।

यह श्लोक 15.2 के रूपक को पूर्णता देता है। जहाँ 15.2 में शाखाओं और जड़ों का विस्तार था, वहीं 15.3 में उपाय बताया गया है — वैराग्य-शस्त्र से इस वृक्ष को काटो।

परंपरा में इस श्लोक को वैराग्य के व्यावहारिक अर्थ के प्रसंग में उद्धृत किया जाता रहा है। 'असङ्गशस्त्र' — आसक्ति-रहितता का शस्त्र — यह पद विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

अध्याय 15 · 3 / 20
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