यह संसार-वृक्ष इतना उलझा हुआ है कि हम इसकी न जड़ देख सकते हैं, न ठीक-ठीक शाखाएँ गिन सकते हैं। इसका न कोई आदि दिखता है, न अंत। जब हम किसी पुराने बरगद के पेड़ को देखते हैं — उसकी जड़ें कहाँ से शुरू हुईं, यह कहना मुश्किल होता है। संसार भी ऐसा ही है।
इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं — इसे समझने की कोशिश करते रहने से काम नहीं चलेगा। एक काम करना होगा — इसे काटना होगा। और काटने का हथियार है वैराग्य — यानी आसक्ति से मुक्ति।
यह वैराग्य कोई उदासी नहीं है। यह एक दृढ़ शस्त्र है — जैसे अनाज की फ़सल काटने के लिए तेज़ हँसिया चाहिए। भीतर की आसक्ति को एक बार दृढ़ता से काटना होगा।