📿 श्लोक संग्रह

अनन्यचेताः सततं

गीता 8.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥
अनन्यचेताः
अन्य में चित्त न लगाने वाला
सततम्
निरंतर
यः
जो
माम्
मुझे
स्मरति
स्मरण करता है
नित्यशः
प्रतिदिन
तस्य
उसके लिए
अहम्
मैं
सुलभः
सुलभ (आसानी से प्राप्य)
नित्ययुक्तस्य
सदा मुझसे जुड़े
योगिनः
योगी के लिए

यह गीता के सबसे मधुर श्लोकों में से एक है। कृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति बिना किसी और में मन लगाए, निरंतर मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं सुलभ हूँ — अर्थात आसानी से मिल जाता हूँ।

"सुलभः" — कितना प्यारा शब्द है! भगवान स्वयं कह रहे हैं कि मैं कठिन नहीं हूँ, मैं दुर्लभ नहीं हूँ — जो मुझे सच्चे दिल से याद करता है, उसके लिए मैं आसान हूँ। जैसे माँ अपने बच्चे के लिए हमेशा पास होती है — बच्चे को बस पुकारना होता है।

लेकिन शर्त एक ही है — "अनन्यचेताः" और "सततम्" — मन कहीं और न भटके, और यह स्मरण निरंतर हो। रोज़ सुबह-शाम भगवान को याद करना, काम करते हुए भी मन में उनका नाम रखना — बस इतना करना है।

यह श्लोक 8.5 से 8.13 तक की पूरी साधना-विधि का सार है — निरंतर स्मरण ही सबसे बड़ी साधना है। जटिल योग-क्रियाएँ न भी कर सको, पर सच्चे मन से भगवान को याद करो — बस इतना काफ़ी है।

अगला श्लोक (8.15) बताता है कि ऐसे भक्त फिर जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं आते — वे भगवान के पास पहुँचकर सदा के लिए दुखों से मुक्त हो जाते हैं।

अध्याय 8 · 14 / 28
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