📿 श्लोक संग्रह

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म

गीता 8.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
ओम् इति
ओम् — यह
एकाक्षरम्
एक अक्षर
ब्रह्म
ब्रह्म (का प्रतीक)
व्याहरन्
उच्चारण करते हुए
माम् अनुस्मरन्
मेरा स्मरण करते हुए
यः प्रयाति
जो जाता है
त्यजन् देहम्
शरीर छोड़ते हुए
सः याति
वह प्राप्त होता है
परमाम् गतिम्
परम गति (मोक्ष) को

कृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति "ओम्" इस एक अक्षर का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है। यह श्लोक 8.12 के साथ मिलकर पूरी साधना-विधि प्रस्तुत करता है।

ओंकार (ॐ) को वेदों में ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। जैसे किसी का नाम लेते ही उसकी पूरी छवि मन में आ जाती है, वैसे ही "ओम्" कहते ही संपूर्ण ब्रह्म का स्मरण हो जाता है।

हमारे बड़े-बुज़ुर्ग इसीलिए हर पूजा, हर मंत्र, हर शुभ काम की शुरुआत "ओम्" से करते हैं। यह एक छोटा-सा अक्षर पूरे ब्रह्मांड का सार है — ऐसा गीता बताती है।

श्लोक 8.11, 8.12 और 8.13 — ये तीनों मिलकर एक पूर्ण योग-विधि बनाते हैं: इंद्रिय-संयम → मन को हृदय में स्थिर करना → प्राण को शिखर पर ले जाना → ओंकार का उच्चारण → भगवान का स्मरण → परम गति।

माण्डूक्य उपनिषद पूरी तरह ओंकार पर आधारित है। कठोपनिषद में भी यम नचिकेता को ओंकार का रहस्य बताते हैं। गीता उसी परंपरा को यहाँ सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है।

अध्याय 8 · 13 / 28
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