कृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति "ओम्" इस एक अक्षर का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है। यह श्लोक 8.12 के साथ मिलकर पूरी साधना-विधि प्रस्तुत करता है।
ओंकार (ॐ) को वेदों में ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। जैसे किसी का नाम लेते ही उसकी पूरी छवि मन में आ जाती है, वैसे ही "ओम्" कहते ही संपूर्ण ब्रह्म का स्मरण हो जाता है।
हमारे बड़े-बुज़ुर्ग इसीलिए हर पूजा, हर मंत्र, हर शुभ काम की शुरुआत "ओम्" से करते हैं। यह एक छोटा-सा अक्षर पूरे ब्रह्मांड का सार है — ऐसा गीता बताती है।