📿 श्लोक संग्रह

सर्वद्वाराणि संयम्य

गीता 8.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
सर्वद्वाराणि
सभी द्वारों (इंद्रियों) को
संयम्य
रोककर
मनः
मन को
हृदि
हृदय में
निरुध्य
स्थिर करके
मूर्ध्नि
मस्तक (शिखर) में
आधाय
स्थापित करके
आत्मनः प्राणम्
अपने प्राण को
आस्थितः
स्थित होकर
योगधारणाम्
योग की धारणा में

कृष्ण योग-साधना की विधि बता रहे हैं। पहला चरण — शरीर के सभी द्वार (आँख, कान, नाक आदि इंद्रियाँ) बंद कर लो, अर्थात इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटा लो। दूसरा — मन को हृदय में स्थिर करो। तीसरा — प्राण को मस्तक के शिखर पर ले जाओ।

यह ऐसे समझें — जैसे जब हम बहुत ध्यान से कोई बात सुनते हैं, तो आँखें अपने-आप बंद हो जाती हैं, कान सिर्फ एक दिशा में लगते हैं। वैसे ही योग में सारी इंद्रियों को भीतर की ओर मोड़ दिया जाता है।

यह श्लोक अगले श्लोक (8.13) के साथ मिलकर पूरी विधि बनाता है — यहाँ शरीर और मन की तैयारी बताई गई, वहाँ ओंकार का उच्चारण बताया जाएगा।

यह श्लोक कठोपनिषद और योगसूत्र की प्रत्याहार (इंद्रिय-संयम) और धारणा (एकाग्रता) की विधि को संक्षेप में प्रस्तुत करता है।

"द्वार" शब्द शरीर की इंद्रियों के लिए प्रयुक्त हुआ है — जैसे घर के दरवाज़े बंद करने से बाहर का शोर नहीं आता, वैसे ही इंद्रियों को रोकने से बाहरी विषयों का प्रभाव नहीं पड़ता।

अध्याय 8 · 12 / 28
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