कृष्ण कहते हैं — जिस अविनाशी तत्त्व को वेदों के ज्ञाता बताते हैं, जिसमें वैराग्य-संपन्न संन्यासी प्रवेश करते हैं, और जिसकी प्राप्ति की इच्छा से साधक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — उस परम पद को मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ।
यह श्लोक एक प्रकार की भूमिका है — कृष्ण कह रहे हैं कि अब मैं तुम्हें वह बात बताने जा रहा हूँ जो ऋषि-मुनियों ने वर्षों की तपस्या से जानी। जैसे कोई दादा अपने पोते को कहे — "बेटा, अब मैं तुम्हें वह बात बताता हूँ जो मेरे दादा ने मुझे बताई थी।"
"संग्रहेण प्रवक्ष्ये" — संक्षेप में बताऊँगा। कृष्ण जानते हैं कि अर्जुन युद्धभूमि पर है, इसलिए लंबी बात नहीं, सार की बात करेंगे।