📿 श्लोक संग्रह

रसोऽहमप्सु कौन्तेय

गीता 7.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥
रसः
रस (स्वाद)
अहम्
मैं हूँ
अप्सु
जल में
कौन्तेय
हे कुंतीपुत्र
प्रभा
प्रकाश
अस्मि
हूँ
शशिसूर्ययोः
चन्द्रमा और सूर्य में
प्रणवः
ॐकार
सर्ववेदेषु
सब वेदों में
शब्दः
ध्वनि
खे
आकाश में
पौरुषम्
पुरुषार्थ, पराक्रम
नृषु
मनुष्यों में

पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि सब कुछ मुझमें गुँथा है। अब इस श्लोक में वे बताते हैं कि वे किन-किन रूपों में मौजूद हैं। पानी पीओ तो उसमें जो रस मिलता है — वह मैं हूँ। सूरज और चाँद में जो रोशनी दिखती है — वह मैं हूँ।

कितनी सरल बात है — जब गर्मी में प्यास लगती है और ठंडा पानी पीते हो, तो जो तृप्ति मिलती है, वह भगवान का ही रूप है। सुबह सूरज की किरणें देखो — वह प्रकाश भगवान है। रात को चाँद की शीतल चाँदनी — वह भी भगवान है। वे हर जगह मौजूद हैं।

वेदों में ॐकार — वह भी भगवान हैं। आकाश में जो ध्वनि गूँजती है — वह भी भगवान हैं। और मनुष्यों में जो पराक्रम है, हिम्मत है, मेहनत करने का बल है — वह भी भगवान हैं। इस तरह रोज़मर्रा की हर चीज़ में ईश्वर को देखना — यही इस श्लोक की शिक्षा है।

यह श्लोक गीता के सातवें अध्याय से है और 7.7 के ठीक बाद आता है। 7.7 में सिद्धांत बताया गया (सब मुझमें गुँथा है) और 7.8 से आगे के श्लोकों में उसके उदाहरण दिए गए हैं।

इस शैली को परंपरा में 'विभूति वर्णन' कहा जाता है — भगवान अपनी विभूतियों (विशेष अभिव्यक्तियों) को बताते हैं। दसवें अध्याय में यह वर्णन और विस्तार से आता है।

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