📿 श्लोक संग्रह

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च

गीता 7.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥
पुण्यः
पवित्र, शुद्ध
गन्धः
गंध, सुगंध
पृथिव्याम्
पृथ्वी में
और
तेजः
तेज, प्रकाश
च अस्मि
और हूँ (मैं)
विभावसौ
अग्नि में
जीवनम्
जीवन, प्राण
सर्वभूतेषु
सभी प्राणियों में
तपः
तपस्या
च अस्मि
और हूँ
तपस्विषु
तपस्वियों में

7.8 में कृष्ण ने जल का रस, चंद्र-सूर्य का प्रकाश, वेदों में ओंकार बताया। यहाँ वे और आगे जाते हैं — मैं पृथ्वी की वह पवित्र सुगंध हूँ। जब वर्षा के बाद मिट्टी से जो खुशबू उठती है — वह मैं हूँ।

अग्नि में जो तेज है, दीपक की जो रोशनी है — वह मैं हूँ। सब प्राणियों में जो जीवन है, जो साँस चल रही है — वह भी मैं हूँ। और जो साधु तपस्या करते हैं, उनकी तप-शक्ति — वह भी मैं हूँ।

यह श्लोक बच्चों के लिए बहुत सुंदर है। बाग़ में फूल की सुगंध में, दादी के हाथ में जो जीवन है — उसी में परमात्मा है।

7.8 से 7.11 तक 'विभूति-परिचय' है — भगवान अपनी अभिव्यक्तियाँ बताते हैं। यह 10वें अध्याय के विस्तृत विभूति-वर्णन की भूमिका है।

तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है — 'रसो वै सः' — वह परमात्मा ही रस है। गीता का यह विभूति-क्रम उसी परंपरा को आगे ले जाता है।

अध्याय 7 · 9 / 30
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