📿 श्लोक संग्रह

बीजं मां सर्वभूतानाम्

गीता 7.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥
बीजम्
बीज
माम्
मुझको
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों का
विद्धि
जान
पार्थ
हे पार्थ
सनातनम्
अनादि, शाश्वत
बुद्धिः
बुद्धि
बुद्धिमताम्
बुद्धिमानों की
अस्मि
हूँ
तेजः
तेज, प्रताप
तेजस्विनाम्
तेजस्वी लोगों का
अहम्
मैं

कृष्ण कहते हैं — सभी प्राणियों का अनादि बीज मैं हूँ। जैसे हर पेड़ के भीतर एक बीज होता है जो उसे उगाता है, वैसे ही हर प्राणी के भीतर परमात्मा वह बीज-शक्ति है।

बुद्धिमानों में जो बुद्धि है — वह परमात्मा की ही देन है। जो छात्र परीक्षा में अच्छा सोचता है, जो बुजुर्ग सही निर्णय लेते हैं — उस बुद्धि के पीछे भी वही शक्ति है।

यह श्लोक अहंकार को शांत करता है। जो भी अच्छाई हम में है — बुद्धि हो या तेज — वह हमारा नहीं, वह परमात्मा का प्रकाश है जो हमारे भीतर चमक रहा है।

'सनातन बीज' की अवधारणा — जो अनादि है — परमात्मा की शाश्वतता को समझाती है। यह अध्याय 10 में विस्तृत विभूति-वर्णन का आधार है।

छांदोग्य उपनिषद् (6.12) में आचार्य श्वेतकेतु को समझाते हैं — 'एतदात्म्यमिदं सर्वम्' — इस बीज में ही सब कुछ है। गीता 7.10 उसी 'बीज-ब्रह्म' परंपरा में है।

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