📿 श्लोक संग्रह

मत्तः परतरं नान्यत्

गीता 7.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
मत्तः
मुझसे
परतरम्
परे, श्रेष्ठतर
नहीं
अन्यत्
कुछ और
किञ्चित्
कुछ भी
अस्ति
है
धनञ्जय
हे धनंजय (अर्जुन)
मयि
मुझमें
सर्वम्
सब कुछ
इदम्
यह
प्रोतम्
गुँथा हुआ, पिरोया हुआ
सूत्रे
धागे में
मणिगणाः
मणियों के समूह
इव
जैसे

इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक बहुत सुंदर उपमा देते हैं। वे कहते हैं — जैसे एक माला में बहुत से मोती होते हैं और सब एक धागे में पिरोए होते हैं, वैसे ही यह सारा संसार मुझमें गुँथा हुआ है। धागा दिखाई नहीं देता, लेकिन वही सब मोतियों को जोड़कर रखता है।

यह उपमा इसलिए सुंदर है क्योंकि दादी जब माला बनाती हैं, तो सबसे पहले धागा लेती हैं। बिना धागे के मोती बिखर जाएँगे। वैसे ही बिना भगवान के यह सारी सृष्टि बिखर जाएगी। वे वह अदृश्य शक्ति हैं जो सब कुछ जोड़कर रखती है।

पहले भाग में कृष्ण कहते हैं कि मुझसे परे कुछ भी नहीं है — कोई शक्ति, कोई सत्ता, कोई तत्व ऐसा नहीं जो मुझसे ऊपर हो। यह परमात्मा की सर्वश्रेष्ठता का सीधा और स्पष्ट वचन है।

यह श्लोक गीता के सातवें अध्याय ज्ञानविज्ञानयोग से है। इस अध्याय में कृष्ण ज्ञान और विज्ञान (सिद्धांत और अनुभव) दोनों की बात करते हैं। इससे पहले के श्लोकों में उन्होंने अपनी दो प्रकृतियों — भौतिक और आध्यात्मिक — का वर्णन किया है।

सूत्र-मणि की उपमा संस्कृत काव्य और दर्शन में बहुत प्रसिद्ध रही है। ब्रह्मसूत्र का नाम भी 'सूत्र' इसीलिए है क्योंकि वे ब्रह्मविद्या के मोतियों को एक धागे में पिरोते हैं।

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