📿 श्लोक संग्रह

एतद्योनीनि भूतानि

गीता 7.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥
एतत्योनीनि
इन दोनों (परा-अपरा) को योनि मानने वाले
भूतानि
सब प्राणी
सर्वाणि
समस्त
इति
इस प्रकार
उपधारय
समझ, जान
अहम्
मैं
कृत्स्नस्य
समस्त
जगतः
जगत का
प्रभवः
उत्पत्ति का कारण
प्रलयः
लय का कारण
तथा
और

कृष्ण स्पष्ट कहते हैं — सारे प्राणी इन दोनों प्रकृतियों (परा और अपरा) से जन्मे हैं। और मैं ही इस पूरे जगत का आरंभ भी हूँ और अंत भी।

जैसे एक नदी किसी पहाड़ से निकलती है और अंत में समुद्र में मिल जाती है — नदी का आदि भी पहाड़ है और अंत भी। वैसे ही यह सारा संसार कृष्ण से निकला है और उन्हीं में लौटेगा।

'प्रभवः प्रलयस्तथा' — उद्गम और लय दोनों। यह एक बड़ा वचन है। आगे के श्लोकों में कृष्ण इसे अनुभव के स्तर पर समझाएँगे।

यह श्लोक 7.4-7.5 का निष्कर्ष है। 'प्रभवः प्रलयस्तथा' की यह घोषणा गीता के 9वें अध्याय में फिर आएगी जहाँ कृष्ण राजविद्या-राजगुह्य का वर्णन करेंगे।

श्वेताश्वतर उपनिषद् (4.1) में कहा गया है — जो एक सबकी योनि में विद्यमान है। गीता की यह घोषणा उसी उपनिषद् परंपरा का सातत्य है।

अध्याय 7 · 6 / 30
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