7.4 में कृष्ण ने आठ तत्वों की बात की — वे 'अपरा' यानी जड़ी प्रकृति है। अब वे कहते हैं — इससे ऊपर मेरी एक और प्रकृति है, जो 'परा' है यानी श्रेष्ठ। वही जीव रूप में सब प्राणियों में है।
जैसे एक घर की दीवारें, छत, ईंटें दिखती हैं — लेकिन उसे थामने वाली नींव दिखाई नहीं देती। वैसे ही यह संसार जड़ तत्वों से बना दिखता है, लेकिन उसे थामती है यह चेतन शक्ति।
'ययेदं धार्यते जगत्' — यह संसार किस पर टिका है? उस परा प्रकृति पर जो हर जीव में चेतना के रूप में है। बिना इस शक्ति के जड़ जगत खड़ा नहीं रह सकता।