📿 श्लोक संग्रह

अपरेयमितस्त्वन्याम्

गीता 7.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
अपरा
निचली (अपरा प्रकृति)
इयम्
यह
इतः
इससे
तु
लेकिन
अन्याम्
दूसरी
प्रकृतिम्
प्रकृति को
विद्धि
जान
मे
मेरी
पराम्
परा, श्रेष्ठ
जीवभूताम्
जीव रूप में परिणत
महाबाहो
हे महाबाहु (अर्जुन)
यया
जिससे
इदम्
यह
धार्यते
धारण किया जाता है
जगत्
संसार

7.4 में कृष्ण ने आठ तत्वों की बात की — वे 'अपरा' यानी जड़ी प्रकृति है। अब वे कहते हैं — इससे ऊपर मेरी एक और प्रकृति है, जो 'परा' है यानी श्रेष्ठ। वही जीव रूप में सब प्राणियों में है।

जैसे एक घर की दीवारें, छत, ईंटें दिखती हैं — लेकिन उसे थामने वाली नींव दिखाई नहीं देती। वैसे ही यह संसार जड़ तत्वों से बना दिखता है, लेकिन उसे थामती है यह चेतन शक्ति।

'ययेदं धार्यते जगत्' — यह संसार किस पर टिका है? उस परा प्रकृति पर जो हर जीव में चेतना के रूप में है। बिना इस शक्ति के जड़ जगत खड़ा नहीं रह सकता।

7.4 और 7.5 मिलकर भगवान की द्विधा प्रकृति का चित्र खींचते हैं — अपरा (जड़) और परा (चेतन)। यह गीता के 13वें अध्याय के 'क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ' विवेचन की भूमिका है।

ऐतरेय उपनिषद् (1.1.1) में कहा गया है — शुरू में एक ही आत्मा था। गीता की 'परा प्रकृति' उसी चेतन तत्व को जीव के रूप में समझाती है जो जगत को धारण करती है।

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