📿 श्लोक संग्रह

भूमिरापोऽनलो वायुः

गीता 7.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
भूमिः
पृथ्वी
आपः
जल
अनलः
अग्नि
वायुः
वायु
खम्
आकाश
मनः
मन
बुद्धिः
बुद्धि
एव च
और भी
अहंकारः
अहंकार, 'मैं' का भाव
इति
इस प्रकार
इयम्
यह
मे
मेरी
भिन्ना
विभाजित, अलग-अलग
प्रकृतिः
प्रकृति
अष्टधा
आठ प्रकार से

कृष्ण कहते हैं — मेरी प्रकृति आठ भागों में बँटी है। पाँच महाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — और तीन भीतरी तत्व — मन, बुद्धि, अहंकार। इन्हें 'अपरा प्रकृति' कहते हैं — जड़ या निचली प्रकृति।

जैसे एक बाग़ में मिट्टी, पानी, धूप, हवा सब मिलकर फूल बनाते हैं — ये सब अलग-अलग हैं लेकिन एक ही माली के बाग़ के हैं। वैसे ही ये आठों तत्व भिन्न-भिन्न दिखते हैं लेकिन सबका मूल एक ही परमात्मा है।

यह श्लोक बताता है कि बाहर जो हम देखते हैं और भीतर जो अनुभव करते हैं — वह सब परमात्मा की ही प्रकृति का हिस्सा है।

7.4 में 'अपरा प्रकृति' और 7.5 में 'परा प्रकृति' — इस तरह कृष्ण दो स्तरों पर अपनी प्रकृति समझाते हैं। यह सांख्य दर्शन की प्रकृति-पुरुष परंपरा से जुड़ा है।

पंचमहाभूत का यह वर्गीकरण तैत्तिरीय उपनिषद् (2.1) में भी मिलता है — आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी। गीता इसी परंपरा में मन-बुद्धि-अहंकार जोड़ती है।

अध्याय 7 · 4 / 30
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