कृष्ण कहते हैं — मुझे प्राप्त करने वाले महात्मा लोग इस दुखों से भरे और क्षणभंगुर संसार में फिर से जन्म नहीं लेते। वे परम सिद्धि को प्राप्त कर चुके होते हैं।
कृष्ण इस संसार को "दुःखालय" कहते हैं — दुखों का घर। और "अशाश्वत" — जो टिकता नहीं। यह कोई निराशा की बात नहीं, बल्कि सत्य का वर्णन है। जैसे बरसात में छतरी लेकर चलना बुद्धिमानी है, वैसे ही संसार को जानकर भगवान की शरण लेना बुद्धिमानी है।
और जो भगवान को पा लेता है, उसे फिर इस दुखों भरी दुनिया में नहीं आना पड़ता — यह सबसे बड़ी मुक्ति है, सबसे बड़ी सफलता है।