📿 श्लोक संग्रह

मामुपेत्य पुनर्जन्म

गीता 8.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥
माम् उपेत्य
मुझे प्राप्त करके
पुनर्जन्म
फिर से जन्म
दुःखालयम्
दुखों का घर
अशाश्वतम्
अस्थायी, क्षणभंगुर
न आप्नुवन्ति
प्राप्त नहीं करते
महात्मानः
महात्मा लोग
संसिद्धिम्
परम सिद्धि
परमाम्
सर्वोच्च
गताः
प्राप्त किए हुए

कृष्ण कहते हैं — मुझे प्राप्त करने वाले महात्मा लोग इस दुखों से भरे और क्षणभंगुर संसार में फिर से जन्म नहीं लेते। वे परम सिद्धि को प्राप्त कर चुके होते हैं।

कृष्ण इस संसार को "दुःखालय" कहते हैं — दुखों का घर। और "अशाश्वत" — जो टिकता नहीं। यह कोई निराशा की बात नहीं, बल्कि सत्य का वर्णन है। जैसे बरसात में छतरी लेकर चलना बुद्धिमानी है, वैसे ही संसार को जानकर भगवान की शरण लेना बुद्धिमानी है।

और जो भगवान को पा लेता है, उसे फिर इस दुखों भरी दुनिया में नहीं आना पड़ता — यह सबसे बड़ी मुक्ति है, सबसे बड़ी सफलता है।

यह श्लोक 8.14 की बात को पूरा करता है — जो निरंतर स्मरण करता है, उसे भगवान सुलभ हैं (8.14), और भगवान को पाने के बाद फिर लौटना नहीं पड़ता (8.15)।

अगले श्लोक (8.16) में कृष्ण बताते हैं कि ब्रह्मलोक तक के सभी लोकों में पुनर्जन्म होता है — केवल भगवान के पास पहुँचने पर ही पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है।

अध्याय 8 · 15 / 28
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