📿 श्लोक संग्रह

सर्वधर्मान्परित्यज्य

गीता 18.66 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
सर्वधर्मान्
सब धर्मों (कर्तव्यों) को
परित्यज्य
छोड़कर
माम्
मेरी
एकम्
एकमात्र
शरणम्
शरण में
व्रज
आओ
अहम्
मैं
त्वा
तुम्हें
सर्वपापेभ्यः
सब पापों से
मोक्षयिष्यामि
मुक्त करूँगा
मा शुचः
शोक मत करो

यह गीता का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपदेश माना जाता रहा है। भगवान कृष्ण कहते हैं — सब चिंता, सब उलझन छोड़कर बस मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब बंधनों से मुक्त कर दूँगा। चिंता मत करो।

इसे ऐसे समझो — जब एक छोटा बच्चा बहुत परेशान हो जाता है, रोने लगता है, तो दादी कहती हैं — 'बस, सब छोड़, मेरे पास आ जा, मैं सँभाल लूँगी।' भगवान भी यही कह रहे हैं। यह शरणागति का सबसे सरल संदेश है।

इस श्लोक में 'मा शुचः' — शोक मत करो — ये दो शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। गीता की शुरुआत अर्जुन के शोक से हुई थी और अंत में भगवान कहते हैं — अब शोक करने की कोई बात नहीं रही। यही गीता की पूरी यात्रा है — शोक से शांति तक।

यह श्लोक गीता के अठारहवें और अंतिम अध्याय मोक्षसंन्यासयोग से है। सारे उपदेश देने के बाद कृष्ण इस श्लोक में अपनी बात का सार एक ही वाक्य में कह देते हैं।

परंपरा में इस श्लोक को 'चरम श्लोक' कहा जाता रहा है — अर्थात गीता का सबसे ऊँचा और अंतिम वचन। यह शरणागति का सबसे प्रसिद्ध श्लोक माना जाता रहा है।

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