📿 श्लोक संग्रह

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः

गीता 8.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
आब्रह्मभुवनात्
ब्रह्मलोक तक
लोकाः
सभी लोक
पुनरावर्तिनः
लौटने वाले
अर्जुन
हे अर्जुन
माम् उपेत्य
मुझे प्राप्त करके
तु
लेकिन
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
पुनर्जन्म
दोबारा जन्म
न विद्यते
नहीं होता

कृष्ण एक बहुत महत्वपूर्ण बात बता रहे हैं — ब्रह्मलोक सहित सभी लोक "पुनरावर्ती" हैं, अर्थात वहाँ से भी लौटना पड़ता है। चाहे कोई स्वर्ग जाए, इंद्रलोक जाए, या ब्रह्मलोक तक — पुण्य समाप्त होने पर वापस आना ही पड़ता है। लेकिन जो मुझे (भगवान को) प्राप्त करता है, उसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता।

इसे ऐसे समझें — जैसे किराए का मकान कितना भी अच्छा हो, एक दिन छोड़ना पड़ता है। लेकिन अपना घर अपना ही रहता है। वैसे ही सभी लोक किराए के मकान हैं — केवल भगवान का धाम अपना शाश्वत घर है।

यह श्लोक बताता है कि स्वर्ग की कामना करना भी अंतिम लक्ष्य नहीं है — अंतिम लक्ष्य तो भगवान की प्राप्ति है, जहाँ से लौटना नहीं होता।

यह श्लोक गीता 9.21 से भी जुड़ता है जहाँ कहा गया है कि स्वर्ग का पुण्य क्षीण होने पर जीव वापस मृत्युलोक में आता है। यहाँ कृष्ण उस बात को और स्पष्ट करते हैं।

अगले श्लोकों (8.17-8.19) में कृष्ण ब्रह्मा के दिन-रात और सृष्टि-प्रलय चक्र का वर्णन करते हैं, जिससे यह स्पष्ट हो कि ब्रह्मलोक भी शाश्वत नहीं है।

अध्याय 8 · 16 / 28
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