📿 श्लोक संग्रह

सहस्रयुगपर्यन्तम्

गीता 8.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥
सहस्रयुगपर्यन्तम्
एक हज़ार युगों तक
अहः
दिन
यत्
जो
ब्रह्मणः
ब्रह्मा का
विदुः
जानते हैं
रात्रिम्
रात्रि को
युगसहस्रान्ताम्
हज़ार युगों में समाप्त होने वाली
ते
वे
अहोरात्रविदः
दिन-रात जानने वाले
जनाः
लोग

कृष्ण काल (समय) की विशालता बता रहे हैं। ब्रह्मा का एक दिन एक हज़ार चतुर्युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) के बराबर होता है, और उनकी एक रात भी उतनी ही लंबी होती है। जो लोग इस बात को जानते हैं, वे ही दिन-रात के सच्चे ज्ञाता हैं।

यह सोचिए — हमारा एक दिन 24 घंटे का होता है। लेकिन ब्रह्मा का एक दिन अरबों वर्षों का है! यह बात सुनकर मन विस्मय से भर जाता है। जैसे एक चींटी के लिए एक बगीचा पूरी दुनिया है, वैसे ही हमारे लिए जो अनंत काल लगता है, वह ब्रह्मा के लिए एक दिन मात्र है।

यह श्लोक बताता है कि काल कितना विशाल है और ब्रह्मलोक भी इसी काल-चक्र में बंधा है — इसलिए सच्ची मुक्ति काल से परे, भगवान के पास ही है।

यह श्लोक 8.16 की बात को पुष्ट करता है — ब्रह्मलोक भी अशाश्वत क्यों है, यह यहाँ स्पष्ट होता है। ब्रह्मा स्वयं काल-बद्ध हैं, उनके भी दिन-रात हैं।

अगले श्लोक (8.18-8.19) में बताया जाएगा कि ब्रह्मा के दिन में सृष्टि प्रकट होती है और रात में प्रलय हो जाता है — यह चक्र बार-बार चलता रहता है।

अध्याय 8 · 17 / 28
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