यह दसवें अध्याय का वह श्लोक है जहाँ से कृष्ण अपनी विभूतियों की गिनती शुरू करते हैं। सबसे पहले वे कहते हैं — मैं सब प्राणियों के हृदय में बैठी हुई आत्मा हूँ। यह सबसे मूल बात है — भगवान बाहर कहीं नहीं, हर प्राणी के भीतर हैं।
फिर कहते हैं — सब प्राणियों का आदि (शुरुआत), मध्य (बीच) और अंत — तीनों मैं ही हूँ। जन्म भी भगवान से, जीवन भी भगवान से, और मृत्यु भी भगवान में। जैसे मिट्टी से बर्तन बनता है, मिट्टी के रहते चलता है, और टूटकर फिर मिट्टी में मिल जाता है।
यहाँ अर्जुन को 'गुडाकेश' कहा गया है — जिसने निद्रा को जीत लिया। यह सम्बोधन अर्जुन के पराक्रम और जागरूकता को दर्शाता है। कृष्ण अपने सबसे जागरूक मित्र को ही यह गहनतम ज्ञान सुना रहे हैं।