📿 श्लोक संग्रह

आदित्यानामहं विष्णुः

गीता 10.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥
आदित्यानाम्
आदित्यों में
अहम् विष्णुः
मैं विष्णु हूँ
ज्योतिषाम्
ज्योतियों में
रविः अंशुमान्
किरणों वाला सूर्य
मरीचिः
मरीचि
मरुताम् अस्मि
मरुतों में हूँ
नक्षत्राणाम्
नक्षत्रों में
अहम् शशी
मैं चंद्रमा हूँ

यहाँ से कृष्ण विभूतियों की सूची शुरू करते हैं। पहला वाक्य ही बड़ा — बारह आदित्यों में मैं विष्णु हूँ। आदित्य सूर्य के बारह रूप हैं जो बारह महीनों में चलते हैं। उनमें सबसे प्रमुख विष्णु हैं। फिर — सब ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य मैं हूँ।

मरुत वायु के देवता हैं — उनमें मरीचि सबसे तेज माने जाते हैं। और नक्षत्रों में चंद्रमा। यह सूची पृथ्वी से आकाश तक फैली है — हर जगह कृष्ण का कोई न कोई रूप है। प्रकाश देने वाली हर चीज में वे हैं।

यह 10.20 के बाद पहली विशिष्ट विभूति है। 10.20 में कृष्ण ने कहा — मैं आत्मा हूँ। 10.21 से वे बाहरी सृष्टि में अपनी उपस्थिति बताते हैं।

भगवद्गीता की यह शैली — हर वर्ग में सबसे उत्कृष्ट को कृष्ण का रूप बताना — पाठक को हर चीज में परमात्मा को देखने की आदत बनाती है।

अध्याय 10 · 21 / 42
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