📿 श्लोक संग्रह

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः

गीता 8.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
अव्यक्तः
अप्रकट
अक्षरः
अविनाशी
इति उक्तः
ऐसा कहा गया
तम् आहुः
उसे कहते हैं
परमाम् गतिम्
परम गति
यम् प्राप्य
जिसे पाकर
न निवर्तन्ते
लौटते नहीं
तत् धाम
वह धाम
परमम् मम
मेरा परम (धाम)

कृष्ण कहते हैं — जिसे अव्यक्त और अक्षर कहा गया है, उसे ही परम गति (सर्वोच्च गंतव्य) कहते हैं। जिसे प्राप्त करके कोई लौटता नहीं — वह मेरा परम धाम है।

"तद्धाम परमं मम" — वह मेरा परम धाम है — यह बड़ी अद्भुत बात है। कृष्ण कह रहे हैं कि जो शाश्वत तत्त्व सृष्टि-प्रलय से परे है, वह कोई शून्य नहीं, वह मेरा घर है। जैसे हर व्यक्ति का एक घर होता है जहाँ वह लौटता है — वैसे ही भगवान का भी एक धाम है, और भक्त वहीं पहुँचता है।

और वहाँ से कोई नहीं लौटता — क्योंकि वहाँ कोई दुख नहीं, कोई कमी नहीं। जब सब कुछ मिल गया, तो लौटने की ज़रूरत ही क्या?

यह श्लोक 8.15-8.16 की बात को पूर्ण करता है — भगवान को पाने वाला लौटता नहीं (8.15), ब्रह्मलोक तक के लोक अशाश्वत हैं (8.16), लेकिन भगवान का धाम शाश्वत है (8.21)।

अगला श्लोक (8.22) बताता है कि इस परम पुरुष को कैसे प्राप्त करें — अनन्य भक्ति से।

अध्याय 8 · 21 / 28
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