कृष्ण कहते हैं — लेकिन उस भौतिक अव्यक्त (प्रकृति) से भी परे एक और तत्त्व है — जो अव्यक्त है, सनातन है, और सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। यह परम तत्त्व — परमात्मा — सृष्टि और प्रलय दोनों से परे है।
इसे ऐसे समझें — बादल आते हैं और जाते हैं, बारिश होती है और रुकती है, लेकिन आकाश सदा वैसा ही रहता है। वैसे ही संसार बनता है और बिगड़ता है, लेकिन परमात्मा सदा अपरिवर्तित रहते हैं।
यह श्लोक बड़ी आशा देता है — इस बदलते संसार में कुछ तो है जो कभी नहीं बदलता, कभी नष्ट नहीं होता। और वही हमारा असली आश्रय है।