📿 श्लोक संग्रह

न जायते म्रियते वा

गीता 2.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
न जायते
जन्म नहीं लेती
म्रियते
मरती है
वा
या
कदाचित्
कभी भी
अयम्
यह (आत्मा)
भूत्वा
होकर
भविता
होगी
न भूयः
फिर नहीं
अजः
जन्मरहित
नित्यः
नित्य, सदा रहने वाली
शाश्वतः
शाश्वत
पुराणः
पुरातन, अनादि
न हन्यते
नष्ट नहीं होती
हन्यमाने शरीरे
शरीर के नष्ट होने पर भी

यह श्लोक आत्मा के स्वरूप का सबसे स्पष्ट वर्णन है। कृष्ण कहते हैं — आत्मा कभी जन्मती नहीं और कभी मरती नहीं। वह पहले नहीं थी ऐसा नहीं, और आगे नहीं होगी ऐसा भी नहीं। वह सदा से है और सदा रहेगी।

चार शब्द आए हैं — अज (जन्मरहित), नित्य (सदा रहने वाली), शाश्वत (अपरिवर्तनीय), और पुराण (अनादि, सबसे पुरानी)। ये चार शब्द मिलकर बता देते हैं कि आत्मा समय की सीमाओं से परे है।

सबसे अंतिम पंक्ति सबसे महत्वपूर्ण है — शरीर के मरने पर भी आत्मा नहीं मरती। जैसे एक मिट्टी का घड़ा टूट जाए तो उसके भीतर का आकाश नहीं टूटता — वैसे ही शरीर के नष्ट होने पर आत्मा वैसी ही रहती है।

यह श्लोक गीता के दूसरे अध्याय से है जहाँ कृष्ण आत्मा की अमरता समझा रहे हैं। यह श्लोक 2.22 (वासांसि जीर्णानि) से पहले आता है और आत्मतत्व का सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करता है।

कठोपनिषद् (1.2.18) में भी लगभग यही श्लोक मिलता है। गीता में कृष्ण ने उपनिषद् के इस ज्ञान को अर्जुन को सीधे सरल शब्दों में सुनाया।

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