📿 श्लोक संग्रह

वेदाविनाशिनं नित्यम्

गीता 2.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥
वेद
जानता है
अविनाशिनम्
अविनाशी
नित्यम्
नित्य
एनम्
इस (आत्मा) को
अजम्
अजन्मा
अव्ययम्
अव्यय, अविकारी
कथम्
कैसे
स पुरुषः
वह पुरुष
कम् घातयति
किसे मरवाता है
हन्ति कम्
किसे मारता है

कृष्ण कहते हैं — हे पार्थ, जो इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है — वह पुरुष किसे मारता है और किसे मरवाता है? यह प्रश्न-रूप में दिया गया उत्तर है — जो ज्ञानी है, वह जानता है कि न वह कोई मारता है, न कोई मरता है।

यह विचार कठिन लगता है, लेकिन इसका सार सरल है। जैसे नाटक में पात्र मरते हैं लेकिन अभिनेता नहीं मरता — वैसे ही शरीर नष्ट होता है पर आत्मा नहीं। जो यह जानता है, उसके लिए हत्या और मृत्यु का अर्थ ही बदल जाता है।

भगवद्गीता के अनुसार यह 2.19 और 2.20 के उपदेश का तार्किक परिणाम है। वहाँ बताया गया था कि आत्मा न मारती है, न मरती है — यहाँ बताया जाता है कि जो यह जानता है, उसे मारने का भय ही नहीं रहता।

कृष्ण यहाँ 'वेद' (जानता है) शब्द का प्रयोग करते हैं — यह सिर्फ़ बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि गहरी अनुभव-आधारित समझ है।

अध्याय 2 · 21 / 72
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