📿 श्लोक संग्रह

य एनं वेत्ति हन्तारं

गीता 2.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥
यः
जो
एनम्
इसे (आत्मा को)
वेत्ति
जानता है
हन्तारम्
मारने वाला
यः च
और जो
मन्यते
मानता है
हतम्
मारा गया
उभौ तौ
वे दोनों
न विजानीतः
नहीं जानते
न हन्ति
न मारता है
न हन्यते
न मारा जाता है

कृष्ण कहते हैं — जो सोचता है कि आत्मा किसी को मारती है, और जो सोचता है कि आत्मा मारी जाती है — वे दोनों अज्ञानी हैं। आत्मा न मारती है, न मारी जाती है।

यह ऐसा है जैसे आईने में दिखता चेहरा — आईना टूट जाए तो क्या चेहरा टूट गया? नहीं। शरीर आईने की तरह है, आत्मा चेहरे की तरह — शरीर नष्ट हो, आत्मा को कुछ नहीं होता।

अर्जुन डर रहे थे कि युद्ध में वे अपने गुरुओं और बंधुओं को 'मार' देंगे। कृष्ण कह रहे हैं — तुम किसी को मार ही नहीं सकते, क्योंकि आत्मा अमर है।

यह श्लोक कठोपनिषद् (1.2.19) से लगभग शब्दशः लिया गया है। गीता में उपनिषदों के अनेक विचार इसी प्रकार आए हैं।

इस श्लोक का सार यह है कि हिंसा केवल शरीर स्तर पर होती है, आत्मा स्तर पर कोई हिंसा संभव नहीं है।

अध्याय 2 · 19 / 72
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