📿 श्लोक संग्रह

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां

गीता 9.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
अनन्याः
एकनिष्ठ, अन्य किसी की शरण न लेने वाले
चिन्तयन्तः
चिंतन करते हुए
माम्
मुझे
ये जनाः
जो लोग
पर्युपासते
सब ओर से उपासना करते हैं
तेषाम्
उनका
नित्याभियुक्तानाम्
सदा लगे रहने वालों का
योगक्षेमम्
प्राप्ति और रक्षा (जो नहीं है उसे पाना और जो है उसकी रक्षा)
वहामि
वहन करता हूँ (उठाता हूँ)
अहम्
मैं

इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक बहुत ही आश्वासन भरी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि जो लोग एकनिष्ठ भाव से मेरा चिंतन करते हैं, उनकी सारी चिंता मैं स्वयं उठा लेता हूँ। जैसे माँ अपने छोटे बच्चे का ख़्याल रखती है — उसे खिलाती है, सुलाती है, बचाती है — वैसे ही भगवान अपने भक्तों का ध्यान रखते हैं।

यहाँ 'योगक्षेम' शब्द बड़ा सुंदर है। 'योग' का अर्थ है जो नहीं मिला है उसे पाना, और 'क्षेम' का अर्थ है जो मिला है उसकी रक्षा करना। भगवान कहते हैं — दोनों काम मैं करूँगा।

इस श्लोक में यह भी कहा गया है कि यह वचन उन भक्तों के लिए है जो 'अनन्य' हैं — अर्थात जिनका मन इधर-उधर नहीं भटकता। जैसे एक दीये की लौ जब हवा से हिलती नहीं तो स्थिर जलती है, वैसे ही स्थिर मन से की गई भक्ति का अपना विशेष स्थान है।

यह श्लोक गीता के नौवें अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग से है। इस अध्याय को गीता का हृदय कहा जाता रहा है क्योंकि इसमें भक्ति का सबसे सीधा और सरल मार्ग बताया गया है।

परंपरा में कहा जाता रहा है कि यह श्लोक भगवान का अपने भक्तों को सबसे बड़ा आश्वासन है। अनेक भक्ति-ग्रंथों में इस श्लोक का उल्लेख बार-बार मिलता है।

अध्याय 9 · 22 / 34
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