भगवान कहते हैं — जो स्वर्ग के सुख के लिए यज्ञ करते हैं, वे वहाँ जाकर खूब भोग करते हैं। पर जब उनका पुण्य समाप्त हो जाता है — तो वे फिर इसी पृथ्वी पर लौट आते हैं। 'गतागतम्' — यह आना-जाना बंद नहीं होता।
'कामकामाः' — जो भोगों की इच्छा लेकर पूजते हैं, वे इसी चक्र में रहते हैं। स्वर्ग एक पड़ाव है, गंतव्य नहीं। मुक्ति के लिए कामनाओं से ऊपर उठना होता है।