📿 श्लोक संग्रह

येऽप्यन्यदेवताभक्ताः

गीता 9.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
ये अपि
जो भी
अन्यदेवताभक्ताः
अन्य देवताओं के भक्त
यजन्ते
पूजते हैं
श्रद्धया अन्विताः
श्रद्धा से युक्त होकर
ते अपि
वे भी
माम् एव
मुझे ही
कौन्तेय
हे कुंती-पुत्र
यजन्ति
पूजते हैं
अविधिपूर्वकम्
विधि के बिना — अनुचित प्रकार से

भगवान यहाँ एक गहरी बात कहते हैं — जो लोग श्रद्धा से अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी वास्तव में मुझे ही पूज रहे हैं। क्योंकि सब देवताओं में भी भगवान ही हैं। श्रद्धा व्यर्थ नहीं जाती।

पर 'अविधिपूर्वकम्' — यह शब्द बताता है कि इस पूजा में पूर्ण ज्ञान नहीं है। सूर्य तक पहुँचना चाहते हैं पर दीपक को देख रहे हैं — यही सीमा है। अगला 9.24 इसकी व्याख्या करता है।

यह श्लोक गीता की सबसे समावेशी पंक्तियों में एक है। भगवान किसी की श्रद्धा को व्यर्थ नहीं कहते — वे केवल बताते हैं कि पूर्ण ज्ञान से पूजा और भी फलदायी होती है।

'अविधिपूर्वकम्' की व्याख्या परंपरा में यह रही है कि जब भक्त यह नहीं जानता कि सब देवता एक ही परम सत्ता के रूप हैं — तब वह पूजा 'विधि-रहित' है। यह निंदा नहीं, मार्गदर्शन है।

अध्याय 9 · 23 / 34
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