भगवान 9.23 की बात आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं — सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। पर जो लोग मुझे तत्त्व से नहीं जानते, वे भटकते रहते हैं।
'तत्त्वेन' — तत्त्व से, यानी असली स्वरूप से। जैसे किसी व्यक्ति का नाम जानना एक बात है, और उनका स्वभाव गहराई से जानना दूसरी बात — वैसे ही भगवान का तत्त्वज्ञान, बाहरी पूजा से परे है।