📿 श्लोक संग्रह

यान्ति देवव्रता देवान्

गीता 9.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
यान्ति
जाते हैं
देवव्रताः
देवताओं की पूजा करने वाले
देवान्
देवों को
पितॄन्
पितरों को
पितृव्रताः
पितरों की पूजा करने वाले
भूतानि
भूत-प्रेतों को
भूतेज्याः
भूतों की पूजा करने वाले
मद्याजिनः
मेरी पूजा करने वाले
अपि माम्
मुझे ही

भगवान यहाँ एक सीधा नियम बताते हैं — जो जिसे पूजता है, वह वहीं पहुँचता है। देव-भक्त देवों के पास, पितर-भक्त पितरों के पास, भूत-भक्त भूतों के पास जाते हैं।

और जो मेरी पूजा करते हैं — 'मद्याजिनः' — वे मुझे पाते हैं। इसमें एक संकेत भी है — मेरी भक्ति का फल सबसे स्थायी है। देव और पितर लोक भी अंततः अस्थायी हैं।

यह श्लोक 9.20-9.21 की भावना से जुड़ता है — जहाँ बताया गया था कि स्वर्ग भी अस्थायी है। यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि उपासना का फल उपास्य देव के अनुसार होता है।

परंपरा में इस श्लोक को उपासना की दिशा के रूप में देखा जाता रहा है। छांदोग्य उपनिषद् में भी कहा गया है कि जो जिस भाव से उपासना करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।

अध्याय 9 · 25 / 34
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