यह गीता के सबसे प्रिय श्लोकों में से एक है। भगवान कहते हैं — मुझे बड़े-बड़े यज्ञ नहीं चाहिए। एक पत्ता, एक फूल, एक फल, थोड़ा-सा जल — बस भक्ति से चढ़ाओ — मैं उसे स्वीकार करता हूँ।
'प्रयतात्मनः' — शुद्ध मन वाले का। अर्थात वस्तु नहीं, भाव देखा जाता है। एक गरीब का पत्ता और एक राजा का सोना — भगवान के लिए भाव ही मायने रखता है।