📿 श्लोक संग्रह

पत्रं पुष्पं फलं तोयं

गीता 9.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
पत्रम्
पत्ता
पुष्पम्
फूल
फलम्
फल
तोयम्
जल
यः
जो
मे
मुझे
भक्त्या
भक्ति से
प्रयच्छति
चढ़ाता है, देता है
तत् अहम्
उसे मैं
भक्त्युपहृतम्
भक्ति से अर्पित
अश्नामि
ग्रहण करता हूँ
प्रयतात्मनः
शुद्ध मन वाले का

यह गीता के सबसे प्रिय श्लोकों में से एक है। भगवान कहते हैं — मुझे बड़े-बड़े यज्ञ नहीं चाहिए। एक पत्ता, एक फूल, एक फल, थोड़ा-सा जल — बस भक्ति से चढ़ाओ — मैं उसे स्वीकार करता हूँ।

'प्रयतात्मनः' — शुद्ध मन वाले का। अर्थात वस्तु नहीं, भाव देखा जाता है। एक गरीब का पत्ता और एक राजा का सोना — भगवान के लिए भाव ही मायने रखता है।

यह श्लोक भक्तियोग का सार है। गीता 9.34 में भगवान फिर कहेंगे — 'मन्मना भव मद्भक्तः' — मन को मुझमें लगाओ। यह श्लोक उसी का आधार है।

परंपरा में इस श्लोक को उन लोगों के लिए विशेष आश्वासन माना जाता रहा है जिनके पास साधन कम हैं। भक्त कवियों ने इसी श्लोक को आधार बनाकर सरल भक्ति की बात कही है।

अध्याय 9 · 26 / 34
अध्याय 9 · 26 / 34 अगला →