📿 श्लोक संग्रह

तस्मात्सर्वेषु कालेषु

गीता 8.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
तस्मात्
इसलिए
सर्वेषु कालेषु
सभी समय में
माम्
मुझे
अनुस्मर
स्मरण करो
युध्य
युद्ध करो
च
और
मयि अर्पित
मुझमें अर्पित
मनोबुद्धिः
मन और बुद्धि
माम् एव
मुझे ही
एष्यसि
प्राप्त होगे
असंशयम्
निःसंदेह

यह गीता के सबसे व्यावहारिक श्लोकों में से एक है। कृष्ण कहते हैं — इसलिए हर समय मेरा स्मरण करो और अपना कर्तव्य (युद्ध) भी करो। अपने मन और बुद्धि मुझमें अर्पित कर दो — तो निश्चित ही तुम मुझे प्राप्त होगे।

ध्यान दीजिए — कृष्ण यह नहीं कहते कि सब कुछ छोड़कर बस ध्यान करो। वे कहते हैं — "मामनुस्मर युध्य च" — मुझे याद करो और अपना काम भी करो। जैसे माँ रसोई में खाना बनाते हुए भी भगवान का नाम लेती रहती है, जैसे किसान खेत में काम करते हुए राम-नाम जपता है — वैसे ही कर्म और भक्ति दोनों साथ-साथ चलें।

यह श्लोक बताता है कि भक्ति के लिए संसार छोड़ने की ज़रूरत नहीं — संसार में रहकर, अपना कर्तव्य करते हुए, मन से भगवान को याद करते रहो।

श्लोक 8.5-8.6 में बताया गया कि अंतिम क्षण का स्मरण महत्वपूर्ण है। अब 8.7 में उसका उपाय बताया गया — हर समय स्मरण करो, तो अंतिम समय में भी वही भाव रहेगा। यह बहुत तार्किक क्रम है।

यह श्लोक कर्मयोग (2.47) और भक्तियोग का सुंदर संगम है — कर्म भी करो, भक्ति भी करो।

अध्याय 8 · 7 / 28
← पिछला अध्याय 8 · 7 / 28 अगला →