कृष्ण एक बहुत गहरी बात कह रहे हैं — अंतिम समय में जिस भी भाव का स्मरण करते हुए कोई शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। यह बात सार्वभौमिक है — केवल भगवान का स्मरण ही नहीं, बल्कि जो भी भाव अंतिम क्षण में मन में होता है, अगला जन्म उसी के अनुसार मिलता है।
इसे ऐसे समझें — जैसे रात को सोने से पहले जो बात मन में घूमती रहती है, सुबह उठते ही वही याद आती है। वैसे ही जीवन का अंतिम क्षण अगले जन्म की दिशा तय करता है।
"सदा तद्भावभावितः" — यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि अंतिम समय का भाव अचानक नहीं आता — जीवनभर जो अभ्यास करते हैं, वही भाव अंत में प्रकट होता है। इसलिए रोज़ भगवान का स्मरण करना ज़रूरी है।