📿 श्लोक संग्रह

यं यं वापि स्मरन्भावं

गीता 8.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
यम् यम्
जिस-जिस
वा अपि
भी
स्मरन्
स्मरण करते हुए
भावम्
भाव को
त्यजति
छोड़ता है
अन्ते
अंत में
कलेवरम्
शरीर को
तम् तम्
उसी-उसी को
एव एति
ही प्राप्त होता है
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
सदा
सदैव
तद्भावभावितः
उसी भाव से भावित

कृष्ण एक बहुत गहरी बात कह रहे हैं — अंतिम समय में जिस भी भाव का स्मरण करते हुए कोई शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। यह बात सार्वभौमिक है — केवल भगवान का स्मरण ही नहीं, बल्कि जो भी भाव अंतिम क्षण में मन में होता है, अगला जन्म उसी के अनुसार मिलता है।

इसे ऐसे समझें — जैसे रात को सोने से पहले जो बात मन में घूमती रहती है, सुबह उठते ही वही याद आती है। वैसे ही जीवन का अंतिम क्षण अगले जन्म की दिशा तय करता है।

"सदा तद्भावभावितः" — यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि अंतिम समय का भाव अचानक नहीं आता — जीवनभर जो अभ्यास करते हैं, वही भाव अंत में प्रकट होता है। इसलिए रोज़ भगवान का स्मरण करना ज़रूरी है।

यह श्लोक 8.5 की बात को और विस्तार देता है। 8.5 में कहा गया कि मुझे याद करने वाला मुझे पाता है — यहाँ सामान्य नियम बताया गया कि जिसका भी स्मरण हो, उसी को पाता है।

इसीलिए अगले श्लोक (8.7) में कृष्ण कहते हैं — "तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च" — इसलिए हर समय मुझे याद करो और युद्ध भी करो।

अध्याय 8 · 6 / 28
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