📿 श्लोक संग्रह

अन्तकाले च मामेव

गीता 8.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
अन्तकाले
अंतिम समय में
और
माम् एव
मुझे ही
स्मरन्
स्मरण करते हुए
मुक्त्वा
छोड़कर
कलेवरम्
शरीर को
यः प्रयाति
जो जाता है
सः
वह
मद्भावम्
मेरे स्वरूप को
याति
प्राप्त होता है
न अस्ति
नहीं है
संशयः
संदेह

यह इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति अंतिम समय में मुझे याद करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है। इसमें कोई संदेह नहीं।

इसे ऐसे समझें — जब कोई बच्चा सोते समय माँ का नाम लेता है, तो सुबह उठते ही सबसे पहले माँ ही दिखती है। वैसे ही, जो अंतिम साँस में भगवान का नाम लेता है, वह भगवान के पास ही पहुँचता है। यह बात कृष्ण पूरे विश्वास के साथ कह रहे हैं — "नास्त्यत्र संशयः" — इसमें ज़रा भी संदेह नहीं।

यह श्लोक बताता है कि मृत्यु के क्षण में मन की दशा कितनी महत्वपूर्ण है। इसीलिए हमारे बड़े-बुज़ुर्ग कहते हैं — रोज़ भगवान का नाम लो, ताकि अंतिम समय में भी वही नाम होठों पर आए।

यह श्लोक अर्जुन के अंतिम प्रश्न (मृत्यु के समय भगवान को कैसे जानें) का सीधा उत्तर है। अगला श्लोक (8.6) इस विषय को और गहरा करता है — अंतिम समय में जिसका भी स्मरण हो, उसी को प्राप्त होते हैं।

भारतीय परंपरा में मृत्यु के समय भगवान का नाम लेने का बड़ा महत्व माना जाता है — गंगा तट पर जाना, तुलसी का पत्ता, राम-नाम — ये सब इसी श्लोक की भावना से जुड़े हैं।

अध्याय 8 · 5 / 28
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