📿 श्लोक संग्रह

यदा यदा हि धर्मस्य

गीता 4.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
यदा यदा
जब-जब
हि
निश्चय ही
धर्मस्य
धर्म की
ग्लानिः
हानि, कमी
भवति
होती है
भारत
हे भारतवंशी (अर्जुन)
अभ्युत्थानम्
बढ़ना, उत्थान
अधर्मस्य
अधर्म का
तदा
तब
आत्मानम्
स्वयं को
सृजामि
प्रकट करता हूँ
अहम्
मैं

इस श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं कि जब-जब संसार में अच्छाई कम होती है और बुराई बढ़ जाती है, तब-तब वे स्वयं प्रकट होते हैं। जैसे जब घर में बहुत अँधेरा हो जाए तो कोई न कोई दीया ज़रूर जलाता है — वैसे ही जब संसार में अन्याय बहुत बढ़ जाता है, तो भगवान आते हैं।

यह बात बड़ी सरल है। बच्चे जब मुश्किल में होते हैं, तो माँ-बाप आकर उनकी मदद करते हैं। ठीक उसी तरह, जब सारी दुनिया परेशान होती है, तो भगवान किसी-न-किसी रूप में आकर सहारा देते हैं।

परंपरा में इस श्लोक को अवतार सिद्धांत का मूल माना जाता रहा है। इसमें बताया गया है कि ईश्वर का संसार में आना कोई एक बार की बात नहीं, बल्कि यह ज़रूरत के अनुसार बार-बार होता रहा है।

यह श्लोक भगवद्गीता के चौथे अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग से है। इस अध्याय में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह ज्ञान उन्होंने सबसे पहले सूर्यदेव को दिया था, और युगों-युगों से यह परंपरा चली आ रही है।

अगला श्लोक (4.8) इसी बात को आगे बढ़ाता है — परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् — अर्थात सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए भगवान प्रकट होते हैं।

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