कृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति अभ्यास-योग से अपने मन को एकाग्र करके, बिना कहीं और भटके, निरंतर परमात्मा का चिंतन करता है, वह उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त होता है।
यहाँ "अभ्यास" शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे कोई बच्चा रोज़-रोज़ लिखने का अभ्यास करता है तो उसकी लिखावट सुंदर हो जाती है, वैसे ही रोज़-रोज़ भगवान का स्मरण करने से मन धीरे-धीरे स्थिर होता जाता है।
"नान्यगामिना" — मन कहीं और न जाए। यह कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। जैसे नदी का पानी धीरे-धीरे एक ही दिशा में बहता रहता है, वैसे ही अभ्यास से मन भी एक दिशा में बहने लगता है — भगवान की ओर।