📿 श्लोक संग्रह

अभ्यासयोगयुक्तेन

गीता 8.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥
अभ्यासयोगयुक्तेन
अभ्यास-योग से युक्त
चेतसा
चित्त से
न अन्यगामिना
अन्यत्र न जाने वाले
परमम्
परम
पुरुषम्
पुरुष (परमात्मा)
दिव्यम्
दिव्य
याति
प्राप्त होता है
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
अनुचिन्तयन्
निरंतर चिंतन करते हुए

कृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति अभ्यास-योग से अपने मन को एकाग्र करके, बिना कहीं और भटके, निरंतर परमात्मा का चिंतन करता है, वह उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त होता है।

यहाँ "अभ्यास" शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे कोई बच्चा रोज़-रोज़ लिखने का अभ्यास करता है तो उसकी लिखावट सुंदर हो जाती है, वैसे ही रोज़-रोज़ भगवान का स्मरण करने से मन धीरे-धीरे स्थिर होता जाता है।

"नान्यगामिना" — मन कहीं और न जाए। यह कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। जैसे नदी का पानी धीरे-धीरे एक ही दिशा में बहता रहता है, वैसे ही अभ्यास से मन भी एक दिशा में बहने लगता है — भगवान की ओर।

यह श्लोक 8.7 की बात को विधि के रूप में प्रस्तुत करता है। 8.7 में कहा "मुझे याद करो" — 8.8 में बताया "कैसे याद करो" — अभ्यास-योग से, एकाग्र चित्त से।

अगले श्लोक (8.9-8.10) में कृष्ण और विस्तार से बताते हैं कि ध्यान के समय परमात्मा के किन गुणों का चिंतन करना चाहिए।

अध्याय 8 · 8 / 28
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