📿 श्लोक संग्रह

कर्मण्येवाधिकारस्ते

गीता 2.47 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
कर्मणि
कर्म में
एव
ही
अधिकारः
अधिकार है
ते
तुम्हारा
मा
नहीं
फलेषु
फलों में
कदाचन
कभी भी
कर्मफलहेतुः
कर्म के फल का कारण
भूः
बनो
सङ्गः
आसक्ति
अकर्मणि
कर्म न करने में

इस श्लोक में कहा गया है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में नहीं। जैसे एक किसान खेत में बीज बोता है, मिट्टी तैयार करता है, पानी देता है — लेकिन फ़सल कब और कितनी आएगी, यह बारिश, मौसम और प्रकृति पर निर्भर करता है। किसान का काम है मेहनत करना, बाक़ी प्रकृति पर छोड़ देना।

भगवान कृष्ण यहाँ यह भी कहते हैं कि फल की इच्छा को कर्म का कारण मत बनाओ। जब हम सिर्फ़ इनाम की लालसा से काम करते हैं, तो काम में मन नहीं लगता और निराशा जल्दी आती है। जो बच्चा पढ़ाई इसलिए करता है कि सीखने में आनंद है, वह ज़्यादा सीखता है उस बच्चे से जो सिर्फ़ नंबरों के लिए पढ़ता है।

साथ ही यह भी कहा गया है कि कर्म न करने की तरफ़ भी मन मत लगाओ। आलस्य कोई समाधान नहीं है। मनुष्य को अपना कर्तव्य पूरी लगन से करते रहना चाहिए।

यह श्लोक भगवद्गीता के दूसरे अध्याय सांख्ययोग से है। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन अपने सगे-संबंधियों को सामने देखकर युद्ध करने से मना कर देते हैं। तब भगवान कृष्ण उन्हें कर्तव्य का उपदेश देते हैं।

परंपरा में यह श्लोक कर्मयोग का सार माना जाता रहा है। निष्काम कर्म — अर्थात बिना फल की आशा के कर्म करना — इस श्लोक की मुख्य शिक्षा है।

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