📿 श्लोक संग्रह

यावानर्थ उदपाने

गीता 2.46 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥
यावान् अर्थः
जितना प्रयोजन
उदपाने
कुएँ में
सर्वतः संप्लुतोदके
चारों तरफ जल भर जाने पर
तावान्
उतना ही
सर्वेषु वेदेषु
समस्त वेदों में
ब्राह्मणस्य
ब्रह्म को जानने वाले के लिए
विजानतः
जो विशेष रूप से जानता है

कृष्ण एक सुंदर उपमा देते हैं — जैसे चारों ओर पानी भरा हो तो कुएँ का उतना ही उपयोग रह जाता है जितना जरूरत के लिए हो — वैसे ही जो ब्रह्म को जानता है, उसके लिए समस्त वेदों में उतना ही है जितना आवश्यक है। ज्ञानी के पास वेदों का सार स्वयं है।

यह उपमा बहुत गहरी है। जब किसी को पूरी नदी का ज्ञान हो, तो वह एक घड़े के पानी के लिए परेशान नहीं होता। जब ब्रह्मज्ञान हो, तो शास्त्रों के विभिन्न अनुष्ठानों की आवश्यकता उतनी नहीं रह जाती।

भगवद्गीता में यह श्लोक ज्ञान और शास्त्र के संबंध को स्थापित करता है। शास्त्र ज्ञान की ओर ले जाने का साधन है — जब ज्ञान हो जाए, तो साधन स्वयं अपना स्थान पा लेते हैं।

यहाँ 'विजानतः' — विशेष रूप से जानने वाले — यानी केवल पुस्तकी ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभव से जानने वाले ब्रह्मज्ञानी की बात है।

अध्याय 2 · 46 / 72
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